| श्री रामचरितमानस » काण्ड 3: अरण्य काण्ड » सोरठा 5a |
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| | | | काण्ड 3 - सोरठा 5a  | सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।
जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय॥5 क॥ | | | | अनुवाद | | | | स्त्री जन्म से ही अपवित्र होती है, परन्तु पति की सेवा करने से वह स्वतः ही सौभाग्य प्राप्त कर लेती है। (पतिभक्ति के कारण) आज भी तुलसीजी भगवान को प्रिय हैं और चारों वेद उनकी स्तुति गाते हैं। | | | | A woman is impure by birth, but by serving her husband she automatically attains good fortune. (Because of her devotion to her husband) Even today Tulsiji is dear to God and all the four Vedas sing her praises. | |
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