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काण्ड 3 - दोहा 24  |
करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात।
कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात॥24॥ |
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| अनुवाद |
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| तब मारीच ने आदरपूर्वक उनकी पूजा करके उनसे पूछा- हे प्रिये! तुम्हारा मन इतना व्याकुल क्यों है और तुम अकेले क्यों आये हो? |
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| Then Marich after worshipping him respectfully asked him- O dear! Why is your mind so restless and why have you come alone? |
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