| श्री रामचरितमानस » काण्ड 3: अरण्य काण्ड » दोहा 16 |
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| | | | काण्ड 3 - दोहा 16  | बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।
तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम॥16॥ | | | | अनुवाद | | | | जो लोग कर्म, वचन और मन से मेरा अनुसरण करते हैं तथा बिना किसी स्वार्थ के मेरी पूजा करते हैं, उनके हृदय कमल में मैं सदैव निवास करता हूँ। | | | | I always reside in the lotus heart of those who follow me in their deeds, words and mind and who worship me without any selfish motive. | |
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