| श्री रामचरितमानस » काण्ड 3: अरण्य काण्ड » चौपाई 29a.2 |
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| | | | काण्ड 3 - चौपाई 29a.2  | हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा॥
बिबिध बिलाप करति बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही॥2॥ | | | | अनुवाद | | | | हाँ लक्ष्मण! इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। मैंने क्रोध किया और इसका फल मुझे मिला। जानकी अनेक प्रकार से विलाप कर रही हैं- (हाय!) भगवान की कृपा तो महान है, पर वे प्रेममय भगवान दूर ही रहे। | | | | Yes Lakshmana! It is not your fault. I got angry and got the result. Janaki is lamenting in many ways- (Alas!) God's grace is great, but that loving God has stayed far away. | |
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