| श्री रामचरितमानस » काण्ड 3: अरण्य काण्ड » चौपाई 29a.1 |
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| | | | काण्ड 3 - चौपाई 29a.1  | हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया॥
आरति हरन सरन सुखदायक। हा रघुकुल सरोज दिननायक॥1॥ | | | | अनुवाद | | | | (सीताजी विलाप कर रही थीं-) हे जगत के अद्वितीय वीर श्री रघुनाथजी! किस अपराध के कारण आप मुझ पर दया करना भूल गए? हे दुःखों को दूर करने वाले, हे शरणागतों को सुख देने वाले, हे रघुकुल के कमल के सूर्य! | | | | (Sitaji was lamenting-) Oh, the unique hero of the world, Shri Raghunathji! Due to what crime did you forget to show mercy on me? Oh, the one who removes sorrows, Oh, the one who gives happiness to those who surrender, Oh, the Sun of the lotus of Raghukul! | |
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