श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  चौपाई 15.1
 
 
काण्ड 3 - चौपाई 15.1 
थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई॥
मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥1॥
 
अनुवाद
 
 (श्री राम जी ने कहा-) हे प्रिये! मैं थोड़े ही समय में सब कुछ बता दूँगा। तुम मन, बुद्धि और हृदय से सुनो! मैं और मेरा, तू और तेरा - यही माया है, जिसने समस्त प्राणियों को अपने वश में कर रखा है।
 
(Shri Ram Ji said-) O dear! I will explain everything in a short time. Listen with all your heart, mind and intellect! I and mine, you and yours - this is the Maya, which has kept all the living beings under its control.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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