| श्री रामचरितमानस » काण्ड 3: अरण्य काण्ड » चौपाई 11.12 |
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| | | | काण्ड 3 - चौपाई 11.12  | परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउँ सो तोही॥
मुनि कह मैं बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परइ झूठ का साचा॥12॥ | | | | अनुवाद | | | | (और कहा-) हे मुनि! मुझे अत्यंत प्रसन्न समझो। तुम जो भी वर मांगोगे, मैं तुम्हें दे दूँगा! मुनि सुतीक्ष्णजी बोले- मैंने कभी वर नहीं माँगा। मैं यह नहीं समझ पाता कि क्या झूठ है और क्या सच, (क्या मांगूँ और क्या नहीं)। | | | | (And said-) O Muni! Consider me extremely pleased. Whatever boon you ask for, I will give it to you! Muni Sutikshnaji said- I have never asked for a boon. I do not understand what is a lie and what is the truth, (what should I ask for and what should I not). | |
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