श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सोरठा 226
 
 
काण्ड 2 - सोरठा 226 
सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर।
सरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल॥226॥
 
अनुवाद
 
 तुलसीदासजी कहते हैं कि ये सुंदर वचन सुनकर श्री रामचंद्रजी को बहुत प्रसन्नता हुई। उनका शरीर आनंद से भर गया और शरद ऋतु के कमल के समान उनके नेत्र प्रेमाश्रुओं से भर गए।
 
Tulsidasji says that on hearing these beautiful words, Shri Ramachandraji felt very happy. His body was filled with joy and his eyes like the lotus of autumn were filled with tears of love.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas