श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  दोहा 87
 
 
काण्ड 2 - दोहा 87 
सुद्ध सच्चिदानंदमय कंद भानुकुल केतु।
चरितकरत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु॥87॥
 
अनुवाद
 
 शुद्ध (प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुणों से रहित, माया से परे दिव्य शुभ स्वरूप) सच्चिदानन्दस्वरूप सूर्यकुल के ध्वजवाहक भगवान श्री रामचन्द्रजी मनुष्यों के समान जीवन जीते हैं, जो संसार सागर से पार जाने के लिए सेतु के समान है।
 
Pure (devoid of the three gunas (qualities) born of nature, divine auspicious form beyond Maya) Lord Shri Ramachandraji, the flag-bearer of the Surya clan in the form of Sachchidananda, lives a life like that of humans, which is like a bridge to cross the ocean of the world.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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