| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » दोहा 81 |
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| | | | काण्ड 2 - दोहा 81  | सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि।
रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि॥81॥ | | | | अनुवाद | | | | दोनों अत्यन्त सुकुमार राजकुमारों और सुकुमार जानकी को रथ में बिठाकर वन दिखाओ और चार दिन बाद लौट आओ। | | | | Take both the very delicate princes and the delicate Janaki in the chariot, show them the forest and return after four days. | |
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