| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » दोहा 78 |
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| | | | काण्ड 2 - दोहा 78  | सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि।
सरद चंद चंदिनि लगत जनु चकई अकुलानि॥78॥ | | | | अनुवाद | | | | सीताजी को यह शीतल, हितकारी, मधुर और कोमल सलाह अच्छी नहीं लगी। (वे इस प्रकार बेचैन हो गईं) मानो शरद ऋतु की चांदनी पाकर चकई (पक्षी) बेचैन हो गई हो॥ | | | | Sitaji did not like this cool, beneficial, sweet and gentle advice. (She became restless like this) as if the Chakai (bird) became restless after being exposed to the moonlight of the autumn season. | |
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