| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » दोहा 77 |
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| | | | काण्ड 2 - दोहा 77  | औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु।
अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु॥77॥ | | | | अनुवाद | | | | (परन्तु इस अवसर पर तो उल्टा ही हो रहा है,) अपराध कोई और करता है और फल कोई और भोगता है। ईश्वर की लीला बड़ी विचित्र है, संसार में कौन उसे जानने में समर्थ है? | | | | (But on this occasion the opposite is happening,) Someone else commits the crime and someone else has to suffer the consequences. God's play is very strange, who in the world is capable of knowing it? | |
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