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काण्ड 2 - दोहा 64  |
प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान।
तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान॥64॥ |
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| अनुवाद |
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| हे मेरे प्रियतम! हे कृपा के धाम! हे सुन्दरी! हे सुख देने वाले! हे ज्ञानी! हे रघुकुल के कमल को पोषित करने वाले चंद्रमा! तुम्हारे बिना तो स्वर्ग भी मेरे लिए नरक के समान है। |
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| O my beloved! O abode of kindness! O beautiful! O giver of happiness! O wise! O the moon that nourishes the lotus of the Raghukul! Without you even heaven is like hell for me. |
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