श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  दोहा 52
 
 
काण्ड 2 - दोहा 52 
जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।
जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति॥52॥
 
अनुवाद
 
 और जिस (विवाह) की सभी स्त्री-पुरुष बड़ी उत्सुकता से कामना करते हैं, उसी प्रकार जैसे शरद ऋतु के स्वाति नक्षत्र की वर्षा के लिए चातक और चातकी तरसते हैं।
 
And which (marriage) all men and women desire with great eagerness, just as the Chatak and the Chataki thirst for the rains of the Swati Nakshatra of the autumn season.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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