श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  दोहा 44
 
 
काण्ड 2 - दोहा 44 
तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु।
बचनु मोर तजि रहहिं घर परिहरि सीलु सनेहु॥44॥
 
अनुवाद
 
 आप सबके हृदय में प्रेरणादायी रूप से विद्यमान हैं। कृपया श्री रामचन्द्र को ऐसी सद्बुद्धि दीजिए कि वे मेरे वचन, शील और स्नेह को त्यागकर घर में ही रहें।
 
You are present in everybody's heart in an inspiring manner. Please give such wisdom to Shri Ramachandra that he abandons my words and modesty and affection and stays at home.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas