| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » दोहा 296 |
|
| | | | काण्ड 2 - दोहा 296  | राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।
सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न ऊतरु देत॥296॥ | | | | अनुवाद | | | | श्री रामचन्द्र की शपथ सुनकर सभासद सहित ऋषिगण और जनक जी स्तब्ध रह गए। कोई उत्तर न दे सका, सब भरत जी की ओर ही ताक रहे थे। | | | | On hearing the oath of Shri Ramchandra, the sages and Janak ji along with the assembly were stunned. No one was able to answer, everyone was staring at Bharat ji. | |
| | ✨ ai-generated | | |
|
|