श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  दोहा 282
 
 
काण्ड 2 - दोहा 282 
लखनु रामु सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु।
गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु॥282॥
 
अनुवाद
 
 कौसल्याजी ने दुखी मन से कहा- श्री राम, लक्ष्मण और सीता को वन चले जाना चाहिए, परिणाम अच्छा होगा, बुरा नहीं। मुझे भरत की चिंता है।
 
Kausalyaji said with a sad heart- Shri Ram, Lakshman and Sita should go to the forest, the result will be good, not bad. I am worried about Bharat.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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