श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  दोहा 263
 
 
काण्ड 2 - दोहा 263 
मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार।
लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार॥263॥
 
अनुवाद
 
 हे भारत! आपके नाम का स्मरण करने मात्र से ही सारे पाप, अज्ञान और सभी प्रकार के अशुभ नष्ट हो जाते हैं तथा मनुष्य इस लोक में यश और परलोक में सुख प्राप्त करता है।
 
O Bharata! Just by remembering your name all sins, ignorance and all kinds of inauspiciousness will vanish and one will attain fame in this world and happiness in the next.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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