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काण्ड 2 - दोहा 238  |
पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर।
मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर॥238॥ |
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| अनुवाद |
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| प्रेम अमृत है, विरह मन्दराचल पर्वत है और भरत अगाध सागर है। दया के सागर श्री रामचन्द्रजी ने देवताओं और ऋषियों के हित के लिए स्वयं ही इस प्रेमरूपी अमृत का (अपने विरहरूपी मन्दराचल पर्वत से) मंथन किया है। |
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| Love is nectar, separation is the Mandara mountain and Bharata is the deep ocean. The ocean of mercy Shri Ramchandraji has churned this love-like nectar himself (with his Mandara mountain of separation) for the benefit of the gods and the sages. |
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