श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  दोहा 230
 
 
काण्ड 2 - दोहा 230 
अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान।
सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान॥230॥
 
अनुवाद
 
 लक्ष्मण को क्रोध से जलते हुए देखकर और उनकी सच्ची शपथ सुनकर सभी लोग भयभीत हो जाते हैं और लोकपाल भी भयभीत होकर भाग जाना चाहते हैं।
 
Seeing Lakshmana burning with rage and hearing his true oath, everybody becomes fearful and the Lokpal gets frightened and wants to run away.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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