| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » दोहा 227 |
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| | | | काण्ड 2 - दोहा 227  | नाथ सुहृद सुठि सरल चित सील सनेह निधान।
सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान॥227॥ | | | | अनुवाद | | | | हे नाथ! आप श्रेष्ठ मित्र (बिना कारण दूसरों का उपकार करने वाले), सरल हृदय, विनय और स्नेह के भंडार हैं, आप सब पर प्रेम और विश्वास करते हैं तथा हृदय में सबको अपना ही मानते हैं। | | | | O Nath! You are the best friend (one who does good to others without any reason), simple hearted and a storehouse of modesty and affection, you love and trust everyone, and in your heart you consider everyone as your own. | |
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