श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  दोहा 225
 
 
काण्ड 2 - दोहा 225 
भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु।
कबिहि अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु॥225॥
 
अनुवाद
 
 उस समय भरतजी में जो प्रेम था, उसका वर्णन शेषजी भी नहीं कर सकते। कवि के लिए वह उतना ही दुर्गम है, जितना अहंकार और आसक्ति से कलुषित मनुष्यों के लिए ब्रह्मानंद।
 
Even Sheshji cannot describe the kind of love Bharatji had at that time. For a poet, it is as inaccessible as Brahmananda is for people tainted with ego and attachment.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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