श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  दोहा 219
 
 
काण्ड 2 - दोहा 219 
राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल।
भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल॥219॥
 
अनुवाद
 
 हे देवराज इन्द्र! श्री रामचंद्रजी के भक्त सदैव दूसरों के कल्याण में लगे रहते हैं, दूसरों के दुःख से दुखी होते हैं और दयालु होते हैं। इसके अतिरिक्त भरतजी भक्तों में श्रेष्ठ हैं, उनसे तुम तनिक भी मत डरो।
 
O Devraj Indra! Devotees of Shri Ramchandraji are always engaged in the welfare of others, they feel sad at the pain of others and are compassionate. Moreover Bharatji is the best among devotees, do not be afraid of him at all.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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