| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » दोहा 190 |
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| | | | काण्ड 2 - दोहा 190  | बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु।
सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु॥190॥ | | | | अनुवाद | | | | (इस प्रकार श्री राम के लिए प्राण त्यागने का निश्चय करके) निषादराज शोक से मुक्त हो गया और सबका मनोबल बढ़ाकर तथा श्री रामचन्द्र का स्मरण करके उसने तुरंत ही तरकश, धनुष और कवच माँग लिए। | | | | (Thus, having resolved to sacrifice his life for Sri Rama) Nishadraj became free from sorrow and, boosting the morale of everyone and remembering Sri Ramachandra, he immediately asked for the quiver, bow and armour. | |
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