| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » दोहा 175 |
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| | | | काण्ड 2 - दोहा 175  | कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि।
रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि॥175॥ | | | | अनुवाद | | | | मंत्री हाथ जोड़कर कह रहे हैं- गुरुजी की आज्ञा मानिए। श्री रघुनाथजी के लौटने पर जो उचित हो, कीजिए। | | | | The minister is saying with folded hands- you must obey Guruji's orders. When Shri Raghunathji returns, do whatever is appropriate. | |
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