| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » दोहा 165 |
|
| | | | काण्ड 2 - दोहा 165  | पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर।
बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर॥165॥ | | | | अनुवाद | | | | हे प्रिय! पिता की आज्ञा से श्री रघुवीर ने आभूषण और वस्त्र त्यागकर छाल के वस्त्र धारण कर लिए। उनके हृदय में न तो शोक था, न हर्ष! | | | | O dear! On the orders of his father, Shri Raghuveer gave up ornaments and clothes and wore bark clothes. There was neither sorrow nor joy in his heart! | |
| | ✨ ai-generated | | |
|
|