श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  दोहा 147
 
 
काण्ड 2 - दोहा 147 
सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु।
भवनु भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु॥147॥
 
अनुवाद
 
 मंत्री के (अकेले) आगमन की सूचना पाकर सारा महल बेचैन हो गया। महल उन्हें इतना भयानक लग रहा था मानो वह भूतों का निवास (श्मशान) हो।
 
The entire palace became restless on hearing the arrival of the minister (alone). The palace seemed so terrifying to them as if it were the abode of ghosts (cremation ground).
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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