| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » दोहा 142 |
|
| | | | काण्ड 2 - दोहा 142  | नहिं तृन चरहिं न पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि।
ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि॥142॥ | | | | अनुवाद | | | | वे न तो चर रहे हैं, न पानी पी रहे हैं। उनकी आँखों से आँसू बह रहे हैं। श्री रामचंद्र के घोड़ों को इस दशा में देखकर सभी निषाद व्याकुल हो गए। | | | | They are neither grazing nor drinking water. Their eyes are shedding tears. Seeing Shri Ramchandra's horses in this condition, all the Nishads became restless. | |
| | ✨ ai-generated | | |
|
|