| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » दोहा 130 |
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| | | | काण्ड 2 - दोहा 130  | स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात।
मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात॥130॥ | | | | अनुवाद | | | | हे प्यारे भाई! तुम दोनों भाइयों को सीता सहित उस व्यक्ति के मन-मंदिर में निवास करना चाहिए जिसके तुम स्वामी, मित्र, पिता, माता और गुरु हो। | | | | O dear brother! You two brothers along with Sita should reside in the temple of the mind of the person for whom you are his master, friend, father, mother and Guru. | |
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