श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  दोहा 127
 
 
काण्ड 2 - दोहा 127 
पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।
जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ॥127॥
 
अनुवाद
 
 तुमने मुझसे पूछा था कि मुझे कहाँ रहना चाहिए? लेकिन मैं तुमसे यह पूछने में हिचकिचा रहा हूँ कि तुम मुझे वह जगह बताओ जहाँ तुम नहीं हो। फिर मैं तुम्हें रहने की जगह बता दूँगा।
 
You asked me where I should stay? But I hesitate to ask you to tell me the place where you are not. Then I will show you a place to stay.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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