| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » दोहा 125 |
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| | | | काण्ड 2 - दोहा 125  | तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ।
मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ॥125॥ | | | | अनुवाद | | | | (और कहा-) हे प्रभु! (पिता की आज्ञा का पालन करना, माता का हित करना, भरत जैसे (प्रेमी और धर्मपरायण) भाई का राजा होना और फिर मुझे आपका दर्शन होना, यह सब मेरे ही पुण्य का प्रभाव है। | | | | (And said-) O Lord! (Following the orders of father, doing good for mother, having a (loving and pious) brother like Bharat as the king and then me getting to see you, all this is the effect of my good deeds. | |
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