| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » दोहा 107 |
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| | | | काण्ड 2 - दोहा 107  | करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार।
तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार॥107॥ | | | | अनुवाद | | | | जब तक मनुष्य अपने कर्म, वचन और विचार से छल-कपट त्यागकर आपका दास नहीं बन जाता, तब तक वह लाख प्रयत्न करने पर भी स्वप्न में भी सुख नहीं पा सकता। | | | | Unless a man gives up deceit in his deeds, words and thoughts and becomes your slave, he cannot find happiness even in his dreams, in spite of trying millions of ways. | |
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