श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  चौपाई 92.4
 
 
काण्ड 2 - चौपाई 92.4 
दरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू॥
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं॥4॥
 
अनुवाद
 
 जहाँ तक सांसारिक वस्तुओं जैसे पृथ्वी, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग-नरक आदि का प्रश्न है, जिन्हें हम देखते, सुनते और मन में सोचते हैं, इन सबका मूल मोह (अज्ञान) है। वास्तव में इनका कोई अस्तित्व नहीं है।
 
As far as the worldly things like earth, house, wealth, city, family, heaven and hell etc. are concerned, which we see, hear and think about in our mind, the root of all these is attachment (ignorance). In reality, these do not exist.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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