श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  चौपाई 55.4
 
 
काण्ड 2 - चौपाई 55.4 
सरल सुभाउ राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी॥
तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका॥4॥
 
अनुवाद
 
 श्री रामचन्द्रजी की सरल स्वभाव वाली माता बड़े धैर्य के साथ बोलीं- हे प्रिये! मैं तुम्हारी कृतज्ञ हूँ, तुमने अच्छा किया। पिता की आज्ञा का पालन करना सभी धर्मों में श्रेष्ठ है।
 
The simple natured mother of Shri Ramchandraji spoke with great patience- O dear! I am grateful to you, you did well. Obeying the orders of one's father is the best of all religions.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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