| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » चौपाई 294.3 |
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| | | | काण्ड 2 - चौपाई 294.3  | सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा। मनहुँ मीनगन नव जल जोगा॥
देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेषी॥3॥ | | | | अनुवाद | | | | यह समाचार सुनते ही सब लोग विचार से व्याकुल हो गए, जैसे मछलियाँ नए (प्रथम वर्षा के) जल के मिलन से व्याकुल हो जाती हैं। देवताओं ने पहले कुलगुरु वसिष्ठजी की (प्रेम-ग्रस्त) स्थिति देखी, फिर विदेहजी का विशेष स्नेह देखा। | | | | On hearing this news, everyone became restless with thoughts, just like fishes become restless with the union of new (first rain) water. The Gods first saw the (love-struck) condition of the family guru Vasishthaji, then saw the special affection of Videhaji. | |
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