श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  चौपाई 272.2
 
 
काण्ड 2 - चौपाई 272.2 
धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई॥
घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे॥2॥
 
अनुवाद
 
 तब जनकजी ने धैर्य धारण करके भरतजी की प्रशंसा करते हुए अच्छे योद्धाओं और साथियों को बुलाया। घर, नगर और देश में पहरा दिया और घोड़े, हाथी, रथ आदि अनेक वाहन सजाए।
 
Then Janakji, having patience and praising Bharatji, called good warriors and companions. He kept guards in the house, city and country and decorated many vehicles like horses, elephants, chariots etc.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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