| श्री रामचरितमानस » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » चौपाई 26.2 |
|
| | | | काण्ड 2 - चौपाई 26.2  | सकउँ तोर अरि अमरउ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी॥
जानसि मोर सुभाउ बरोरू। मनु तव आनन चंद चकोरू॥2॥ | | | | अनुवाद | | | | यदि आपका शत्रु अमर (ईश्वर) भी हो, तो भी मैं उसे मार सकता हूँ। बेचारे नर-नारी, कीड़े-मकोड़ों जैसे, कुछ भी नहीं हैं। हे सुंदरी! आप मेरा स्वभाव जानती हैं कि मेरा मन सदैव आपके मुख रूपी चंद्रमा की ओर आकर्षित रहता है। | | | | Even if your enemy is immortal (God), I can kill him as well. Poor men and women like insects are nothing. O beautiful lady! You know my nature that my mind is always attracted towards the moon in the form of your face. | |
| | ✨ ai-generated | | |
|
|