श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  चौपाई 182.3
 
 
काण्ड 2 - चौपाई 182.3 
डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु कर नाहिन सोचू॥
एकइ उर बस दुसह दवारी। मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी॥3॥
 
अनुवाद
 
 मुझे इस बात का भय नहीं कि संसार मुझे बुरा कहेगा, न ही मैं परलोक के विषय में सोचता हूँ। मेरे हृदय में केवल एक ही असह्य अग्नि जल रही है कि मेरे कारण श्री सीता और रामजी दुःखी हुए।
 
I am not afraid that the world will call me bad, nor do I think about the afterlife. There is only one unbearable fire burning in my heart that Shri Sita and Ramji were saddened because of me.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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