श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  चौपाई 165.2
 
 
काण्ड 2 - चौपाई 165.2 
देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस काहे न होई॥
माताँ भरतु गोद बैठारे। आँसु पोछिं मृदु बचन उचारे॥2॥
 
अनुवाद
 
 कौशल्या का स्वभाव देखकर सभी कह रहे हैं- श्रीराम की माता का स्वभाव ऐसा क्यों न हो? माता ने भरत को गोद में बिठाया और उनके आँसू पोंछते हुए धीरे से बोलीं-
 
Seeing Kausalya's nature, everyone is saying- why shouldn't Shri Ram's mother have such a nature. The mother made Bharat sit on her lap and wiped his tears and spoke softly-
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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