| श्री रामचरितमानस » काण्ड 1: बाल काण्ड » सोरठा 85 |
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| | | | काण्ड 1 - सोरठा 85  | धरी न काहूँ धीर सब के मन मनसिज हरे।
जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ॥85॥ | | | | अनुवाद | | | | किसी के हृदय में धैर्य नहीं था, कामदेव ने सबके हृदय चुरा लिए थे। उस समय केवल वे ही जीवित बचे जिनकी रक्षा श्री रघुनाथजी ने की थी। | | | | No one had patience in their hearts, Kaamdev stole everyone's heart. Only those who were protected by Shri Raghunathji survived at that time. | |
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