श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सोरठा 2
 
 
काण्ड 1 - सोरठा 2 
मूक होइ बाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन।
जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलिमल दहन॥2॥
 
अनुवाद
 
 वह दयालु (परमेश्वर) जिसकी कृपा से गूंगा भी सुन्दर वक्ता बन जाता है और लंगड़ा भी कठिन पर्वत पर चढ़ जाता है, कलियुग के समस्त पापों को जला देता है, वह मुझ पर दया करें।
 
May that merciful (God) who by whose grace a mute becomes a beautiful speaker and a lame person can climb a difficult mountain, burn away all the sins of Kaliyug, have mercy on me.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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