श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  श्लोक 3
 
 
काण्ड 1 - श्लोक 3 
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्‌।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥3॥
 
अनुवाद
 
 मैं शंकर रूपी ज्ञानवान, सनातन गुरु की पूजा करता हूँ, जिनके आश्रय से टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र पूजित हो जाता है।
 
I worship the knowledgeable, eternal Guru in the form of Shankar, by relying on whom even the crooked moon is worshipped everywhere.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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