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काण्ड 1 - दोहा 63  |
सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध।
सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध॥63॥ |
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| अनुवाद |
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| लेकिन वह भगवान शिव का अपमान सहन नहीं कर सकी। इससे उसका हृदय प्रफुल्लित नहीं हुआ। तब उसने हठपूर्वक सारी सभा को डाँटा और क्रोधित होकर बोली। |
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| But she could not tolerate the insult of Lord Shiva. This did not enlighten her heart. Then she stubbornly scolded the entire gathering and spoke angrily. |
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