श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  दोहा 4
 
 
काण्ड 1 - दोहा 4 
उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति॥4॥
 
अनुवाद
 
 दुष्ट लोगों का स्वभाव ही होता है कि वे किसी के भी हित से ईर्ष्या करते हैं, चाहे वह उदासीन व्यक्ति हो, शत्रु हो या मित्र। यह जानकर वह व्यक्ति हाथ जोड़कर उनसे प्रेमपूर्वक विनती करता है।
 
It is the nature of wicked people that they become jealous of anyone's welfare, be it an indifferent person, an enemy or a friend. Knowing this, this person lovingly requests them with folded hands.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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