| श्री रामचरितमानस » काण्ड 1: बाल काण्ड » दोहा 229 |
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| | | | काण्ड 1 - दोहा 229  | सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत।
चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत॥229॥ | | | | अनुवाद | | | | नारदजी के वचनों को स्मरण करके सीताजी के हृदय में शुद्ध प्रेम उमड़ आया। वे आश्चर्य से चारों ओर देख रही हैं, मानो कोई भयभीत हिरणी इधर-उधर देख रही हो। | | | | Remembering the words of Naradji, Sitaji felt pure love in her heart. She is looking everywhere in surprise, as if a frightened doe is looking here and there. | |
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