| श्री रामचरितमानस » काण्ड 1: बाल काण्ड » दोहा 185 |
|
| | | | काण्ड 1 - दोहा 185  | सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर।
अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर॥185॥ | | | | अनुवाद | | | | मेरी बात सुनकर ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए, उनका शरीर पुलकित हो गया और उनकी आँखों से प्रेम के आँसू बहने लगे। तब धैर्यवान ब्रह्माजी सचेत हो गए और हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे। | | | | Brahmaji was very happy after listening to me, his body was thrilled and tears of love started flowing from his eyes. Then the patient Brahmaji became alert and started praising with folded hands. | |
| | ✨ ai-generated | | |
|
|