श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  चौपाई 81.3
 
 
काण्ड 1 - चौपाई 81.3 
जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥
तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥3॥
 
अनुवाद
 
 मैं लाखों जन्मों तक इस बात पर अड़ी रहूँगी कि या तो मैं भगवान शिव से विवाह करूँगी या फिर कुंवारी रहूँगी। चाहे स्वयं भगवान शिव मुझे सौ बार भी कहें, मैं नारदजी की बात नहीं छोड़ूँगी।
 
I will remain adamant for millions of births that either I will marry Lord Shiva or else I will remain a virgin. Even if Lord Shiva himself tells me a hundred times, I will not abandon the advice of Naradji.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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