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काण्ड 1 - चौपाई 59.1  |
नित नव सोचु सती उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा॥
मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनि पतिबचनु मृषा करि जाना॥1॥ |
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| अनुवाद |
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| सतीजी के हृदय में प्रतिदिन एक नया और भारी विचार उठ रहा था कि मैं इस दुःख के सागर से कब पार होऊँगी। मैंने श्री रघुनाथजी का अपमान किया और फिर अपने पति के वचनों को झूठा समझ लिया। |
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| Every day a new and heavy thought was arising in Satiji's heart that when will I cross this sea of sorrow. I insulted Shri Raghunathji and then considered the words of my husband to be a lie. |
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