श्री रामचरितमानस  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  चौपाई 56.1
 
 
काण्ड 1 - चौपाई 56.1 
सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ॥
कछु न परीछा लीन्हि गोसाईं। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाईं॥1॥
 
अनुवाद
 
 श्री रघुनाथजी का प्रभाव समझकर सती ने भय के मारे शिवजी से छिपा लिया और कहा- हे स्वामिन्! मैंने आपकी किसी प्रकार परीक्षा नहीं ली, (वहाँ जाकर) आपके समान ही प्रणाम किया।
 
Understanding the influence of Shri Raghunath, Sati hid it from Shiva out of fear and said- O Swamin! I did not test you in any way, (on going there) I bowed down just like you.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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