| श्री रामचरितमानस » काण्ड 1: बाल काण्ड » चौपाई 47.1 |
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| | | | काण्ड 1 - चौपाई 47.1  | जैसें मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी॥
जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई॥1॥ | | | | अनुवाद | | | | हे नाथ! आप कृपा करके मुझे भी वही कथा विस्तारपूर्वक सुनाइए, जिससे मेरा यह महान् भ्रम दूर हो जाए। इस पर याज्ञवल्क्य मुस्कुराए और बोले, आप श्री रघुनाथजी का बल जानते हैं। | | | | O Nath! Please tell me the same story in detail so that this big confusion of mine is dispelled. On this Yagyavalkya smiled and said, you know the power of Shri Raghunathji. | |
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